Thursday, 5 March 2026

2/12, 4/5

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। 

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

(गीता अध्याय ४)

श्रीमद्भगवद्गीता से परिचय तो उस समय से ही था जब मैं कक्षा ९ में अध्ययन कर रहा था। इसका प्रथम अध्याय ही उस समय हमारे कोर्स की संस्कृत की पुस्तक में था। उत्सुकता और जिज्ञासावश अलग भी इसका अध्ययन करने का विचार आया और गीताप्रेस के द्वारा प्रकाशित गुटका संस्करण को पढ़ना शुरू किया जिसमें संस्कृत के मूल श्लोक हिन्दी में उनका सरल अर्थ भी दिया गया था। इसमें संदेह नहीं किया जा सकता है कि श्रीमद्भगवद्गीता सनातन धर्म का सर्वमान्य और वेदों उपनिषदों, पुराणों आदि से भी अधिक महत्वपूर्ण शास्त्र और धर्मग्रन्थ है। उस समय में संस्कृत से भी अनभिज्ञ था, इसलिए उस समय हिन्दी अनुवाद के सहारे इस ग्रन्थ की विषय-वस्तु को जानने समझने का प्रयास किया। कुछ वर्षों पहले ही इस ओर ध्यान गया और बहुत बाद में यह स्पष्ट हुआ कि साहित्य के अतिरिक्त संस्कृत के सभी ग्रन्थ अर्थपरक तो होते ही हैं, और प्रधानतः तो वे प्रयोजनपरक ही होते हैं। क्योंकि और इसलिए उनका अनुवाद या अर्थ किसी भी अन्य भाषा में सुगमता से किया ही नहीं जा सकता। और शायद यही कारण है कि शंकराचार्य जैसे महापुरुषों ने भी इन ग्रन्थों पर भाष्यों (commentary) की ही रचना की। परंपरा यह भी है कि इन ग्रन्थों के न्यायोचित तात्पर्य को स्पष्ट करने के लिए इनके विद्वज्जनों के बीच शास्त्रार्थ भी होता था न कि बस कोरा बौद्धिक विवाद। इसलिए शास्त्रार्थ के समापन पर किसी एक आचार्य के सिद्धांत पर सभी सहमत होते थे।

इस बारे में अपने स्वतंत्र अध्ययन से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इन सभी शास्त्रों का गूढ तात्पर्य समझ सकना सामान्य मनुष्य के लिए ही नहीं संस्कृत भाषा के प्रकांड पंडितों के लिए भी लगभग असंभव ही है। इसका कारण यही है कि इनका भाषागत और आभासी अर्थ और मूल अर्थ एक दूसरे से बहुत भिन्न हैं। इसे ही मैं हमारी भाषा में cryptic invisible lock  कहता हूँ। केवल कोई आत्मज्ञानी या ऋषि ही इस मूल अर्थ को आभासी अर्थ से अलग जान और स्पष्ट कर सकता है। यहाँ एक अन्य  कठिनाई यह भी है कि केवल कोई आत्मज्ञानी ही किसी दूसरे आत्मज्ञानी को पहचान सकता है और वह फिर भी इसका न तो कोई दावा करता है, न ही कर सकता है। इस तरह का दावा करना भी हास्यास्पद ही है! मूल और आभासी अर्थ के अंतर को स्पष्ट करने के लिए मैं केवल निम्नलिखित एक उदाहरण दे रहा हूँ -

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपः।

न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।।१२।।

(अध्याय १२)

इस उपरोक्त श्लोक के मूल अर्थ को जानने के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि यहाँ पर अहं-पद का प्रयोग व्यक्ति के अर्थ में किया गया है या शुद्ध ब्रह्म-पद-निर्दिष्ट आत्मा के अर्थ में।

इसके ही एक और उदाहरण से इस पोस्ट का प्रारंभ है।

वैसे भी कई और अनेक कारणों से अब ब्लॉग-लेखन से मैं पूरी तरह से निवृत्त होने जा रहा हूँ। हो सकता है कि इस ब्लॉग में यह मेरा अंतिम पोस्ट हो। अगर चाहें और संभव हो तो कृपया मेरे सभी ब्लॉग्स के सभी पोस्ट्स को कहीं सुरक्षित (copy-paste / save) कर लें जिससे कि मेरे यहाँ उपलब्ध न होने पर भी आप फिर कभी इन्हें देख सकें।

Good bye!

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