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Thursday, 1 September 2022

विधि-प्रपञ्च है या माया!

कविता : अश्वत्थः प्राहुरव्ययम्।।

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एक दीपक जल रहा, 

बिना बाती, बिन तेल, 

चिज्ज्योति में चल रहा,

विधि-प्रपञ्च का खेल!

एक वृक्ष ऐसा उगा, 

जिसका बीज न मूल,

शाखा, पत्र, असंख्य हैं,

नहि फल हैं, बस फूल!

अभी अभी है, हो रहा,

नहि था, न होगा फिर, 

यह पल जैसे जुग अनंत,

न आरंभ, न ही है अंत!

एक झूला डाल पर, 

हवा में है, डोलता,

उस पे बैठा है मनुज,

भाग्य अपना तौलता!

तराजू के पलड़े दो,

हो रहे नीचे ऊपर,

काँटा इधर से उधर,

चल रहा अस्थिर चंचल,

क्या होता है, क्या पता, 

जब दीपक बुझ जाता है, 

दृष्टा का दृश्य प्रपञ्च से,

क्या रहस्यपूर्ण यह नाता है!

***

 



 


Friday, 24 June 2022

तुम कौन?

कविता : 

होना, जानना, करना और मन

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तुम मन हो, 

या सोचते हो, 

कि तुम मन हो! 

या मन ही सोचता है, 

कि मैं मन हूँ, 

यदि मन सोचता है, 

कि वह सोचता है,

तो उसे सोचने दो! 

यदि मन कहता है,

कि वह कहता है,

तो उसे कहने दो!

क्या मन सुनता भी है? 

क्या तुम सोच सकते हो? 

क्या तुम कह सकते हो?

क्या तुम सुन सकते हो? 

सोचने-कहने के लिए, 

कुछ किया जाना होता है। 

सुनने के लिए,

क्या कुछ किया जाना होता है?

सोचना-कहना कर्म है,

सोचने-कहनेवाला कर्ता है!

क्या सुनना भी कर्म है?

या है सिर्फ होना! 

जैसे नदी होती है,

धूप और छाया होती है!

सुख और दुःख होते हैं!

कर्म और कर्ता होता है!

कार्य और क्रिया होती है!

क्या वह, जो कि होता है,

जानता है?

कि मैं हो रहा हूँ? 

तुम जानते हो, 

या नहीं जानते, 

लेकिन तुम हो बस,

यह जानना भी तुम हो!

यह जानना, न कर्म है, न कर्ता,

यह जानना, होना है, न कि करना!

यह होना, जानना है, न कि करना!

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Friday, 10 June 2022

एक कविता

व्याज-निर्व्याज / दुंदुभी

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समर-गीत

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कल 10-06-2022, 07:33 संध्याकाल लिखा था, किन्तु यहाँ संशोधित कर प्रस्तुत कर रहा हूँ, ताकि किसी प्रकार के संशय की संभावना न रहे।

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उस तरफ उन्माद है, 

इस तरफ है अवसाद! 

उस तरफ है दंभ मद, 

इस तरफ परन्तु विषाद! 

तो, -- कर रहा है, मृत्यु से, 

नचिकेता, यह सख्य-संवाद, 

"समर के पर्यवसान में, 

शोक होगा, या आह्लाद!

क्या होगा परिणाम मृत्यो?!"

प्रश्न पूछा यमराज से, 

यम ने कहा, "तुम जानते हो,

तुम ही कहो, अब वत्स हे!

तुम ही कहो, क्या है भविष्य,

तुम ही कहो, जो सत्य है!"

नचिकेता हँसे, फिर बोले -

"जानता हूँ, हे आचार्य! 

द्विजगण हैं, अन्न उसके, 

और तुम हो शाक, आर्य!

इसलिए पूछा था तुमसे, 

प्रश्न मैंने, यह आचार्य! 

युद्ध से भय क्या करना,

काल के हैं सभी ग्रास!

इस समर में भी मुझे तो, 

लग रहा यही स्वीकार्य,

काल करे कार्य उसका,

हम करें कर्तव्य-कार्य!"

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जय महाकाल !

जय महादेव !!

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