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Friday, 23 September 2022

शीक्षा-वल्ली

तैत्तिरीय उपनिषद्

वल्ली - १

प्रथम अनुवाक : शान्तिपाठ 

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः।...  अवतु वक्तारम्।। 

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः!!!

यह अनुवाक शान्ति पाठ है। इसकी विवेचना पिछले पोस्ट में की गई है।

यह प्रथम अनुवाक समाप्त हुआ।

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द्वितीय अनुवाक 

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शीक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः।  मात्रा बलम्। साम संतानः। इत्युक्तः शीक्षाध्यायः।

विवेचना : 

शास् शासन करना, और शिक्ष् सीखना दोनों धातुओं से शिक्षा और शीक्षा (वैदिक प्रयोग) संज्ञा रूप बने।

समस्त शिक्षा वाणी के माध्यम से ही प्रदान और ग्रहण की जाती है। प्राकृत वाणी के प्रयोग में व्यावहारिक प्रचलन और परंपरा के अनुसार भाव एवं अर्थ को प्रकट एवं ग्रहण किया जाता है, और वह भिन्न भिन्न स्थानों पर इसीलिए भिन्न भिन्न रूप ग्रहण करती है, इसलिए मनुष्य की बुद्धि की सीमा में ही उसे प्रयोग किया जा सकता है। तकनीकी दक्षता और कौशल सीखने या सिखाने के लिए वाणी के प्रयोग की अधिक आवश्यकता नहीं होती और वाणी के माध्यम से भी किसी भी भाषा में इस ज्ञान का आदान-प्रदान किया जा सकता है। किन्तु वेद अर्थात् आत्मा के आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक सत्य के ज्ञान को सीखने और सिखाने के लिए इन प्राकृत भाषाओं का प्रयोग अपर्याप्त सिद्ध होता है। वाणी अग्नि ही है और आज के विज्ञान के मत से भी वाणी (Sound) और अग्नि (Fire) मूलतः ऊर्जा के ही दो प्रकार हैं । अंग्रेजी भाषा का 'Sound' शब्द संस्कृत शब्द 'स्वन' या 'स्वर' का ही सज्ञात (cognate) या अपभ्रंश है। इसी प्रकार  'Fire' भी 'स्फुर्' का सज्ञात (cognate) या अपभ्रंश है।

इसलिए भौतिक ज्ञान से भिन्न आधिदैविक और आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा के लिए प्राकृत भाषा(ओं) के उपयोग की एक सीमा है, और चूँकि वाणी स्वयं भी आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीन रूपों में होती है, इसलिए वाणी के देवता रूपी माध्यम की सहायता से ही उच्चतर आधिदैविक और आध्यात्मिक सत्यों की शिक्षा दी जा सकती है।

वाणी के भौतिक रूप को वैखरी कहा जाता है, जिस भाषा का प्रयोग व्यवहार में किया जाता है उसे वाक् कहा जाता है। यही वाक् विचार के रूप में मन में कार्यरत होती है। इस विचाररूपी वाणी की भाषा तो वही प्राकृत होती है जिसे कि मनुष्य व्यवहार में तथा बोलचाल में काम में लाता है। देवी अथर्वशीर्ष में इसे ही पशुओं की भाषा अर्थात् प्रकृति से प्राप्त भाषा की संज्ञा दी गई है। पश्यते पश्यति, पाशयति पाश्यते इति पशुः । पशु जो देखता है पाश में बद्ध होता है। मनुष्य की पशुओं से श्रेष्ठता इसीलिए होती है क्योंकि मनुष्य के पास मन नामक यंत्र होता है, जिसे वह बिना बोली जानेवाली भाषा के रूप में मनन के रूप में विचार के माध्यम से प्रयोग कर सकता है। 

किन्तु जब तक मनुष्य भाषागत विचार के सहारे मनन करता है, तब तक वाणी का देवता जागृत नहीं होता। वाणी के देवता का  आधिदैविक स्वरूप तब प्रकट होता है जब स्वर और व्यञ्जन अर्थात् वर्ण की शुद्धता स्पष्ट होती है। इस प्रकार प्रत्येक वर्ण, स्वर तथा व्यञ्जन स्वयं ही देवता होता है। जैसे भरत के नाट्य-शास्त्र में संचारी भावों की संख्या / कोटि 33 है, उसी प्रकार से वाणी के देवता भी 33 कोटि के होते हैं। यह वैज्ञानिक सत्य है, क्योंकि ऋषियों ने इसका आविष्कार अनुसंधान किया है। इन्हीं वर्णों के समूह से मंत्रों के रूप में देवताओं के आधिदैविक तत्व को जाना गया। वर्णः स्वरः का अर्थ हुआ - वाणी के वर्ण स्वर हैं और मात्रा बलम्  का अर्थ हुआ उस वर्ण के उच्चारण किए जाने के लिए जो बल (accent) लगाया जाता है, वह उस वर्ण की मात्रा (amount,  strength) है । इनकी सुसंगति ही साम है। साम ही संतान, सातत्य या फल और परिणाम है। यह हुआ शीक्षाध्यायः। प्राकृत का संस्कृत में उत्परिवर्तन (mutation / evolution) ही श्रुति है। इसलिए संस्कृत तथा वेद के ज्ञान की शिक्षा वाणी के माध्यम से ही दी एवं ग्रहण की जा सकती है। इसी आधार पर, और वाणी के शुद्ध स्वरूप को सुरक्षित करने के लिए लिपि के आविष्कार से भी पहले से आचार्य और शिष्य परंपरा प्रारंभ हुई। इस विकास यात्रा के दो पक्ष हैं। एक है नागरी (या देवनागरी) तथा दूसरा है द्रविड लिपि का प्रयोग। इन दोनों ही पक्षों में इस तथ्य का ध्यान रखा गया है कि लिखी हुई (लिपिबद्ध) भाषा की शुद्धता और ध्वनिसाम्य शुद्धता समान हो। द्रविड भाषा में एक ओर तो ग्रन्थलिपि में वैदिक ज्ञान का संग्रह किया गया, साथ ही मौखिक परंपरा से भी इसकी शुद्धता सुनिश्चित की गई। संस्कृत हो या द्रविड, वाणी और उच्चारण की शुद्धता का महत्व उतना और वैसा ही है जैसे कम्प्यूटर के किसी प्रोग्राम की रचना करते समय कोडिंग-डिकोडिंग का।

संस्कृत भाषा और नागरी लिपि में लिखे गए ग्रन्थों में अधोमात्रा (आड़ी लकीर, जो नीचे लगाई जाती है) और ऊर्ध्वमात्रा (खड़ी लकीर, जो ऊपर लगाई जाती है) के द्वारा स्वरित,अनुदात्त और  का संकेत किया जाता है, वहीं अवग्रह के चिह्न ऽ तथा १, २, ३ आदि अंकों से भी उच्चारण की शुद्धता सुनिश्चित की जाती है। 

किन्तु यह तो स्पष्ट ही है कि किसी आचार्य से वैदिक शिक्षा को ग्रहण किया जाना अधिक उपयुक्त है। 

द्रविड या தமிழ் लिपि में यह कठिनाई इसलिए और अधिक है क्योंकि वहाँ एक ही वर्णाक्षर के एक से अधिक उच्चारण होते हैं, जबकि यह कठिनाई नागरी लिपि में नहीं होती। फिर भी नागरी लिपि में किसी सीमा तक उच्चारण को शुद्ध रखा जाना संभव है।

दूसरी ओर इसका एक लाभ यह भी है कि कोई अनधिकारी या अपात्र इस ज्ञान को न प्राप्त कर सके।

महाभाष्य में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं --

दुष्टो शब्दो स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।

स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्।।

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Wednesday, 21 September 2022

तैत्तिरीयोपनिषद्

शान्तिपाठ 

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः।

शं नो भवत्वर्यमा।

शं न इन्द्रो बृहस्पतिः।

शं नो विष्णुरुरुक्रमः।

नमो ब्रह्मणे।

नमस्ते वायो।

त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।

त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि।

ऋतं वदिष्यामि।

सत्यं वदिष्यामि।

तन्मामवतु।

तद्वक्तारमवतु।

अवतु माम्।

अवतु वक्तारम्। 

ॐ शान्तिः !शान्तिः !!शान्तिः!!!

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मित्र (सूर्य) हमें शान्ति प्रदान करें, और वरुण (समुद्र तथा जल) हमें शान्ति प्रदान करें। सूर्य और वरुण अधिभौतिक इन्द्रियगम्य  स्थूल लोकों के लिए प्रत्यक्ष हैं। अर्यमा (सूर्य, जो पितृलोक का शासन करते हैं) हमें शान्ति प्रदान करें। पितृलोक वह लोक है, जहाँ भूलोक में मृत्यु हो जाने के बाद जीव कुछ समय तक वास किया करते हैं, पितरों को इस प्रकार देवता-विशेष माना जाता है, जिनका अस्तित्व आधिदैविक एवं आधिमानसिक दोनों ही स्तरों पर माना जाता है। देवताओं के शासनकर्ता इन्द्र, - हमारे लिए शान्ति प्रदान करें। इन्द्र और बृहस्पति देवताओं के शासक एवं गुरु भी हैं।

ॐ

गणानां त्वा गणपतये हवामहे

कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्।।

ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत

आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्।।०२३।।

(ऋग्वेद मण्डल २)

ॐ गं गणपतये नमः ।।

गणपति ही इन्द्र, बृहस्पति, सूर्य, विष्णु भी हैं, क्योंकि एकमेव तत् सत् ब्रह्म अनेक उपाधियों के माध्यम से युक्त होकर विभिन्न प्रकार  से जाना जाता है।

विष्णु अर्थात् उरुक्रम के रूप में जिस परमात्मा ने तीनों लोकों को तीन क्रमिक चरणों में क्रमशः व्याप्त किया है, वही विष्णु, वे परब्रह्म परमात्मा हमें शान्ति प्रदान करें।

उस ब्रह्म के लिए नमस्कार। हे वायुदेवता! आपको नमस्कार!! चूँकि वायु स्थूल जगत् में तो सर्वत्र गतिशील हैं, सूक्ष्म रूप से भी वे ही प्राणों की भी गति हैं और उस रूप में भी वे देवता हैं, जो कि भूलोक (स्थूल भौतिक) और भुवर्लोक (संसार रूपी जीवन) में सतत संचार करते हैं। वायुदेवता! आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आपको ही (मैं) प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा। मैं वाणी से परे के सत्य को अर्थात् ऋत् को वाणी से कहूँगा। (मैं) व्यावहारिक रूप से जिसे सत्य कहा जाता है, उसे ही कहूँगा। वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे। वह वाणी के माध्यम से सत्य को कहने वाले वक्ता की रक्षा करे। वह मेरी रक्षा करे। वह वक्ता की रक्षा करे।

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!

इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों ही प्रकारों से सर्वत्र शान्ति व्याप्त हो। 

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Saturday, 23 July 2022

प्रसव-प्रतिप्रसव

Creation, Existence and Dissolution.

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Terminology :

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प्राण (cosmic energy),

रयि (cosmic material),

चेतना (sentience inherent),

शरीर (Body), मन (mind) चित्त (consciousness),

अस्तित्व (Existence),

भान (Intelligence / Consciousness),

चैतन्य (Awareness),

Give rise to :

The apparent relative Time (काल).

The idea of Cause (कारण), and Effect (कार्य), is the notion, that rises up in the individual.

बुद्धि (Intellect), -- the sentient being, who has such a अन्तःकरण (psyche).

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नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।। 

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयो तत्त्वदर्शिभिः।।१६।।

अविनाशी तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।।१७।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २)

जन्माद्यस्य यतः।।

(ब्रह्मसूत्र १/१/२)

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असन्नेव स भवति।

असद्ब्रह्मेति वेद चेत्।

अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद।

सन्तमेनं ततो विदुरिति। 

तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।

अथातोऽनुप्रश्नाः।

उता विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती३।

आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता३ उ। 

सोऽकामयत्।

बहु स्यां प्रजायेयेति।

स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा इद्ँसर्वमसृजत यदिदं किं च।

तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्।

तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्।

(त्यत् च अभवत् -- त्यत् - असौ, ditto the same, = सः,  the one described earlier) 

निरुक्तं चानिरुक्तं च।

निलयनं चानिलयनं च।

विज्ञानं चाविज्ञानं च।

सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्।

यदिदं किं च।

तत्सत्यमित्याचक्षते।

तदप्येष श्लोको भवति। 

(तैत्तिरीय उपनिषद् - ब्रह्मान्दवल्ली, षष्ठमनुवाक)

अथ सप्तम अनुवाक :

असद्वा इदमग्र आसीत्।

ततो वै सदजायत।

तदात्मान्ँ स्वयमकुरुत। 

तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत* इति। 

यद्वै तत्सुकृतं* रसो वै सः।

(* कठोपनिषद् - सुकृत १-३-१)

रस्ँ ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। 

को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।

एष एव ह्यानन्दयति। 

यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलमनमभयं प्रतिष्ठां विन्दते।

अथ सो अभयं गतो भवति।

यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरं अन्तरं कुरुते।

अथ तस्य भयं भवति।

तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य।

तदप्येष श्लोको भवति।

सप्तम अनुवाक समाप्त।। 

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सदेव सौम्य इदमग्र आसीत्।।

ततो असत् अजायत।। 

अथ वा असत् एव....

यदासीत अग्रे  .... 

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इस प्रकार अस्तित्व जो है, नित्य, शाश्वत, सनातन और अविनाशी (दृष्टा) है, जिसका विनाश नहीं हो सकता।

"यह है, -अस्ति यत्, - अस्तित्व," -- ऐसा कोई कहता है।

यह कहनेवाला कोई चेतन तत्व है, न कि जड। 

कहनेवाला चेतन ही दृष्टा है और वह जिस अस्तित्व को देखता है जिसका ईक्षण करता है वह जड दृश्य है।

चेतन के द्वारा ईक्षण होने की घटना ही तप है। 

ईक्षण रूपी अग्नि में ही उस चेतन के ही प्रसंग से, जड सतत रूपान्तरित होता हुआ, - जो है, उसे ही प्रतीत होता है।

यह हुआ प्रसव (Creation / Evolution) ।

इस प्रक्रिया के इस क्रम में जन्म एक बिन्दु है जहाँ अविनाशी अवयक्त से व्यक्त रूप ग्रहण करता है। तब क्रमशः पहले जड और चेतन में, और इसके बाद अन्तःकरण और बाह्यकरण के रूप में और विकसित होता है।

यह सब कब प्रारंभ हुआ? -- यह प्रश्न बुद्धि में ही उठता है, और प्रमादवश (because of inattention) बुद्धि (intellect) में ही इस प्रकार काल (Time) की प्रतीति और काल / समय का आभासी जन्म होता है । अविनाशी, नित्य, सनातन शाश्वत इस अस्तित्व पर चेतन में बुद्धि के व्यक्त होने के परिणाम से ही, उस बुद्धि से ही काल का उद्भव हुआ।

काल का (उद्भव / उत्पन्न होने से पहले) 'कब' का प्रश्न ही कहाँ और कैसे उठ सकता है?

अक्षरात्संजायते कालः कालाद् व्यापकः उच्यते....।। 

यह हुआ काल और व्यापक आकाश (space) जो मूलतः वही अविनाशी है जो कि दृष्टा है और जो दृष्टा की तरह से अविकारी आधारभूत (Immutable prime principle) है। 

इति प्रसवः।। 

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अथ प्रतिप्रसवः

पातञ्जल योग-सूत्र (अध्याय २) : साधनपाद

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः।।१।।

समाधि भावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च।।२।।

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः।।३।।

अविद्या -- क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्।।४।।

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या।।५।।

अस्मिता --

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतैवास्मिता।।६।।

राग: --

सुखानुशयी रागः।।७।।

द्वेषः --

दुःखानुशयी द्वेषः।।८।।

अभिनिवेशः --

स्व-रसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः।।९।।

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।।१०।।

(ते क्लेशाः प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः)

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।११।।

(ध्यानहेयाः तत् वृत्तयः)

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इति प्रतिप्रसवः।। 

***